Saturday, 26 January 2013

एक साथ


तुझे पाने की मन्नत
और जमाने का डर
आजकल एक साथ ही आते है

आए तो थे कई बार
तुझे अपने दिल का हाल बताने
तेरे ज़ुल्फो की शाखो मे लिपटे
अपने घायल दिल को छुड़ाने
मगर क्या बताए जानेमन
तेरा दिल जीतने की मेरी आरजू
और मुझे हराने की तेरी ज़िद
आजकल एक साथ ही आते है

वो झुकी पलकों के अफ़साने
वो होटो की नज़ाकत
वो गालों पे दमकती हुई हसीं
और आँखों की शरारत
बचना तो लाख चाहा था हमने
इन कातिल अदाओंसे
मगर क्या बताए जानेमन
नज़रोंसे घायल करने की तेरी शिद्दत
और उसपे मर मिटने की हमारी हरकत
आजकल एक साथ ही आते है

कभी हमने भी सोचा था
सब छोड़ कर कहीं दूर चले जाएँ
तेरी गलियों से निकलकर
अपनी गलियों मे लौट आए
मगर क्या बताए जानेमन
शराब छोड़ने की हमारी चाहत
और आँखों से पिलाने की तेरी आदत
आजकल एक साथ ही आते है

-- भालचंद्र भुतकर