Saturday, 26 January 2013

एक साथ


तुझे पाने की मन्नत
और जमाने का डर
आजकल एक साथ ही आते है

आए तो थे कई बार
तुझे अपने दिल का हाल बताने
तेरे ज़ुल्फो की शाखो मे लिपटे
अपने घायल दिल को छुड़ाने
मगर क्या बताए जानेमन
तेरा दिल जीतने की मेरी आरजू
और मुझे हराने की तेरी ज़िद
आजकल एक साथ ही आते है

वो झुकी पलकों के अफ़साने
वो होटो की नज़ाकत
वो गालों पे दमकती हुई हसीं
और आँखों की शरारत
बचना तो लाख चाहा था हमने
इन कातिल अदाओंसे
मगर क्या बताए जानेमन
नज़रोंसे घायल करने की तेरी शिद्दत
और उसपे मर मिटने की हमारी हरकत
आजकल एक साथ ही आते है

कभी हमने भी सोचा था
सब छोड़ कर कहीं दूर चले जाएँ
तेरी गलियों से निकलकर
अपनी गलियों मे लौट आए
मगर क्या बताए जानेमन
शराब छोड़ने की हमारी चाहत
और आँखों से पिलाने की तेरी आदत
आजकल एक साथ ही आते है

-- भालचंद्र भुतकर






Thursday, 22 December 2011

सोचा था तेरे जाने के बाद...


सोचा था तेरे जाने के बाद
नज़ाने कितनी राते यादों मे बीत जाएँगी
कम्बख़्त पहली ही रात
चैन की नींद आयी

नज़ाने कितने ख्वाब देखे थे
मैने अपनी जुदाई के
हर ख्वाब मे तेरी याद थी और हर याद मे गम
टूटा हुआ दिल और तनहा राते
कैसे सह पाएँगे हम
नज़ाने क्यूँ मगर
एक अजीब सी खुशी छाई है
तेरे जाने के बाद
हर लमहे की हँसी लौट आयी है
अब ना टूटा हुआ दिल है और ना रातों मे तनहाई
कम्बख़्त पहली ही रात चैन की नींद आयी

सोचा था तेरे जाने के बाद
हर शक्स अजनबी होगा
मयखाने मे गुज़रेगी हर श्याम
और हर गम रूबरू होगा
नज़ाने क्यूँ मगर
मे मस्ती मे झूम रहा हूँ
तेरे जाने की खुशी मे
दिन रात पी रहा हूँ
अब ना तू है ना तेरे जाने का गम
और ना दुखों की गहराई
कम्बख़्त पहली ही रात चैन की नींद आयी

सोचा था तेरे जाने के बाद
किसी मोड़ पर अचानक
फिरसे मुलाकात होगी
" मैने तुम्हे पहले भी कहीं देखा है "
यही कहोगी तुम
और उसी मोडपर मेरी कयामत होगी
नज़ाने क्यूँ मगर
इन बाहों को अब तेरा इंतेज़ार नहीं है
मुलाकात होगी तो शायद तुम्हे पहचान लेंगे
इतना भी अब यकीन नही है
ज़रा गौर से सुन ए बेवफा
तू नही तो और सही , और नही तो कोई और सही
कम्बख़्त पहली ही रात चैन की नींद आयी

-- भालचंद्र भुतकर

Monday, 19 September 2011

रविवार सकाळ

      रविवारची सकाळ ,साडे सात -आठ ची वेळ .बाल्कनितुन येणार कोवळ उन आणि हवेत जाणवणारा मंद गारवा अंगावर घेत,रेडियो वर लागेलेले पंडित भीमसेन जोशींचे भक्तिसंगीत एइकत चेहरयवर मंद हास्य घेऊन उभा असलेला मी. हातामाधल्या पोह्याच्या प्लेट मधून येणार्‍या गरम वाफा, चोहीकडून कानावर पडणारा पक्ष्यांचा कार्णमधुर  आवाज, स्वयंपाकघरातून येणारा वाफळ्त्या चहाचा मस्त वास ,आणि पूर्वेकडून हळूहळू वर येणारा माझा " मित्र " -अत्यंत तेजस्वी,प्रसन्न...  आम्ही दोघेही बराच वेळ एकमेकांकडे एकटक बघत राहतो ,शेवटी वैतागून तोच मला म्हणतो छ्या .....स्साला तूच जास्त नशिबवान आहेस...मी शांतपणे हसून त्याला नमस्कार करतो आणि मग आत येऊन खुर्चिवर डोळे मिटून बसतो पंडित भीमसेन जोशिना एइकत.....शांतपणे

                                                                                             ---- भालचंद्र भुतकर